Saturday, August 01, 2015

आज एक कवि से मुलाक़ात हुई

आज एक कवि से मुलाक़ात हुई।
बहुत अच्छा लिखता है।
लब्ज़ों का सहारा सहारा है, बैसाखी नहीं उसकी,
मगर उसे अपने हुनर पर इतना यकीन भी नहीं।

पढ़ने वाले जान जाएँगे दोहराई-दोहराई सी उसकी सोच है,
सुनने वाले जान जाएँगे गहरी कोशिशों में कितना संकोच है।
लिख पाना अपने-आप में एक सफ़र है,
और सफ़र में आभूषण व औज़ार ना हो,
तो कवि सजाए कैसे, क़दम बढ़ाए कैसे?

अनुभव और स्मृति-स्तुति-सामग्री,
तुम्हारा कोश उमड़ता हुआ, मेरा कुछ ख़ाली है अभी।
जिऊँगा कुछ और, और गुज़ारते ये दिन, शब, सुबह,
अनुभव की झोली को भरता जाऊँगा।
शायद कवि कहलाऊँगा, और फ़िर कोई और कहेगा...

आज एक कवि से मुलाक़ात हुई।
बहुत अच्छा लिखता है।
लब्ज़ों का सहारा, सहारा है बैसाखी नहीं उसकी,
मगर उसे अपने हुनर पर इतना यकीन भी नहीं।